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१६. मुक्या प्राण्यांची कैफियत (6th - Marathi)

१६. मुक्या प्राण्यांची कैफियत

(माणूस वनामध्ये गाई चारायला घेऊन गेला होता. गाय चरत असताना एक चिमणी उडत उडत तिच्याजवळ येते.)
चिमणी:    चिव चिव चिव गं! तिकडे तू कोण गं?
गाय:        अगं मी कपिला मावशी का गं चिऊ उदास दिसशी ?
चिऊ :      काय सांगू गाई गाई, 
               छाती धडधडते पहा बाई! 
               काय करू सुचतच नाही! 
               भीती फार वाटते बाई ॥
गाय :       अगं अगं चिऊताई । 
               मोबाईलचा आवाज, 
               तुज सहन न होई ॥ 
               तू आहेस नाजुकशी । 
               आवाजाने होशी कासाविशी ॥ 
               (गायही आपले डोळे पुसते.)
चिऊ :      कपिला मावशी काय गं झाले ? 
               तुझेसुद्धा डोळे का पाणावले ?
गाय :       काय सांगू चिऊताई ! 
               प्लॅस्टिकचा बघ ढीग किती ? 
               घासाबरोबर प्लॅस्टिक जाते 
               माझे तर पोटशूळच उठते !!
चिऊ :      काय करावे, सुचत नाही
               मानव शहाणा होतच नाही.
गाय :       चल गं जाऊ तलावावर, 
                पाणी पिऊ घोटभर । 
                (दोघी तलावाच्या काठावर जातात.)
मासोळी :  अगं कपिला, अगं चिऊ । 
                नका इथले, पाणी पिऊ ॥
चिऊ :      का गं, का गं मासोळी ? 
                तू तर राहतेस याच जळी ॥
मासोळी : अगं इथले जल विषारी । 
                तगमग जीवाची होते भारी ॥ 
                पाणी आहे घाण घाण । 
                तडफडती जलचरांचे प्राण ॥
गाय :        ते बघ आले नागोबा.
चिऊ :       (नागोबास उद्देशून बोलते.) अहो, अहो नागोबा आज का झाले रागोबा ?
नागोबा :    नाही वारूळ, नाही शेती
                 मला पकडून, लाह्या देती ! 
                 नको नको ती अंधश्रद्धा मानवा, 
                 डोळे जरा उघड आता !
गाय :         (माणसाला उ‌द्देशून बोलते.) 
                 का मुक्या प्राण्यांना देता त्रास ? 
                 का जंगलांचा करता ऱ्हास ? 
                 वाघोबा मग घालतात झडप 
                 तुम्हांलाच करतात पोटात गडप !
सर्व प्राणी : मानवा मानवा ऐक तर खरे. 
                 वनचरे आता नच तुझे सोयरे
                 करत राहाशील जर प्रदूषित सारे
                 धरती माता देईल दूषणे 
                 तडफडशील मग दूधाविना 
                 तडफडशील मग अन्नाविना
                 तेव्हाच होईल आमचे स्मरण
                 जागृत होऊन राखशील 
                  पर्यावरण पर्यावरण ! पर्यावरण ! 
                  (माणूस खाली मान घालतो.)
माणूस :      नका नका हो असे बोलू, 
                  आम्ही आमचे वर्तन बदलू 
                  पर्वत, जल, वातावरण 
                  नाही करणार प्रदूषण ॥ 
                  सदा करीन वृक्षारोपण 
                  हिरवेगार वनीकरण ॥ 
                  कीटक, पक्षी अन् जलचर
                  सगेसोयरे तुम्ही वनचर ॥

ज्योती वैद्य - शेटे



“मुक्या प्राण्यांची कैफियत” या पाठचा हिंदी अनुवाद


मूक प्राणियों की फरियाद
(एक गेय नाट्यरूपांतरण)

[दृश्य: एक जंगल का किनारा। एक व्यक्ति गाय को चराने लाया है। एक चिड़िया उड़ती हुई गाय के पास आती है।]

चिड़िया (गाते हुए):
चूं चूं चूं! ओ बहना कौन हो तुम?
क्या तुम भी हो दुखी, क्यों हो गुमसुम?

गाय (स्नेह से):
मैं हूं कपिला मावसी, क्यों हो चिऊ उदास?
बोलो न मुझसे, क्या है वो बात खास?

चिड़िया:
कैसे बताऊं, दिल है डरा डरा,
हर आवाज़ से काँपे ये तन-सारा।
मोबाइल की गूंज सह ना सकूं,
भीतियों में मैं बस रह ना सकूं।

गाय (भावुक होकर):
सच कहूं चिऊताई, मुश्किल है हाल,
मेरे पेट में उठे प्लास्टिक का जाल।
घास के संग वो आ जाता है भीतर,
होती है पीड़ा, जैसे जलता हो अंतर।

[गाय और चिड़िया दुखी हो जाती हैं और जलाशय की ओर जाती हैं।]

चिड़िया:
चलो बहना, प्यास बुझाएं,
तलाब के जल से घूंट तो पाएं।

[तलाब किनारे मछली उन्हें देखती है।]

मछली (चेतावनी देती):
रुको रुको बहनों! ये पानी नहीं है साफ,
ज़हर है इसमें, जीवन की हो जाती है क्षाफ।

चिड़िया:
पर तुम तो रहती हो यहीं,
कैसे सहती हो जल की यह पीड़ा कहीं?

मछली:
बोलूं क्या? जल में घुल गया है जहर,
तड़प रहे हम, जीवन बना है कहर।

[गाय और चिड़िया चकित हो जाती हैं। तभी नाग आता है।]

चिड़िया:
नाग बाबा! आज क्यों हो क्रोधित?
क्या है कारण, क्यों हो तुम व्यथित?

नाग (गाते हुए):
ना है वारूळ, ना कोई खेत,
मानव ने कर दिया सबका अन्तिम लेख।
मूढ़ बनते अंधविश्वास में,
जलाते हमें अज्ञान के त्रास में।

गाय (मनुष्य की ओर मुखातिब होकर):
क्यों करते हो तुम अत्याचार?
क्यों उजाड़ते हो हर उपवन-भूभाग?

सभी प्राणी (एकत्र गाते हैं):
ओ मानव! अब तो सुन ले बात,
वनचर अब नहीं रहेंगे तेरे साथ।
धरती माता रोएगी दिन-रात,
भूखा-प्यासा तू रह जाएगा तात।

मनुष्य (पछताकर):
माफ करो, मैं समझ गया अब,
पर्यावरण ही है जीवन का सबक।
वृक्ष लगाऊंगा हर एक जगह,
जीव-जंतु बनेंगे मेरे सगे।





"मुक्या प्राण्यांची कैफियत" यावर आधारित स्वाध्याय प्रश्नोत्तर


🟦 १. कवितेवर आधारित सरळ प्रश्नोत्तर (Long Answer Questions)

प्र.१) चिमणीला कोणती भीती वाटत होती?
उत्तर: चिमणीला मोबाईलचा आवाज सहन होत नव्हता. तो आवाज इतका त्रासदायक होता की तिला छातीत धडधड होत होती आणि ती घाबरली होती.

प्र.२) गाय आणि चिमणीने तलावात पाणी का प्यायले नाही?
उत्तर: मासोळीने त्यांना सांगितले की तलावाचे पाणी विषारी आहे. त्यामुळे तिथले पाणी प्यायल्यास जीव धोक्यात येईल, म्हणून त्यांनी पाणी प्यायले नाही.

प्र.३) नागोबाला राग का आला होता?
उत्तर: नागोबाला राग आला कारण माणसे त्याला पकडून लाह्या देतात, म्हणजे त्याच्यावर अंधश्रद्धेने आधारित हिंसाचार करतात. त्याच्या निवाऱ्याचे ठिकाणही माणसे उद्ध्वस्त करतात.

प्र.४) माणूस शेवटी काय प्रतिज्ञा करतो?
उत्तर: माणूस शेवटी मान खाली घालून पशुपक्ष्यांच्या विनवण्या ऐकतो आणि आपले वर्तन सुधारण्याचे आश्वासन देतो. तो वृक्षारोपण करील, प्रदूषण करणार नाही असे म्हणतो आणि सर्व सजीवांना आपले सगे मानतो.


🟩 २. निवडून योग्य पर्याय लिहा (MCQ Type Questions)

प्र.१) चिमणी काय ऐकून घाबरलेली होती?
अ. विजेचा आवाज
ब. मोबाईलचा आवाज ✅
क. वादळाचा आवाज
ड. ढगांचा आवाज

प्र.२) गाईला पोटशूळ का होत होता?
अ. थंडीमुळे
ब. प्लास्टिक खाल्ल्यामुळे ✅
क. उपासामुळे
ड. चुकून विषारी औषध खाल्ल्यामुळे

प्र.३) मासोळीने पाणी पिऊ नये का सांगितले?
अ. कारण पाणी खूप गरम होते
ब. कारण ते विषारी झाले होते ✅
क. कारण तलाव रिकामा होता
ड. कारण ती नदीत राहायची


🟨 ३. खालीलपैकी योग्य वाक्य ओळखा (True/False)

  1. गाय व चिमणी तलावात पाणी प्यायल्या. ❌

  2. नागोबाला माणसाच्या अंधश्रद्धेचा त्रास होतो. ✅

  3. चिमणी व गाय मनुष्यावर प्रेम करतात. ✅

  4. माणूस शेवटी पशुपक्ष्यांचे म्हणणे नाकारतो. ❌


🟪 ४. कविता समजून घेण्यासाठी प्रश्न (Interpretative Questions)

प्र.१) कविता आपल्याला काय शिकवते?
उत्तर: कविता आपल्याला पर्यावरण रक्षणाचे महत्त्व सांगते. माणसाने आपले वर्तन सुधारले पाहिजे, प्रदूषण थांबवले पाहिजे आणि मुक्या प्राण्यांचे रक्षण केले पाहिजे, अशी शिकवण ती देते.

प्र.२) कवितेत कोणत्या मुक्या प्राण्यांची कैफियत मांडली आहे?
उत्तर: गाय, चिमणी, मासोळी आणि नागोबा यांची कैफियत कवितेत मांडलेली आहे.


🟫 ५. कवितेतील रचना व भाषाशैली (Language and Style)

  • छंद: संवादात्मक शैली, कथा व भावनिक संवाद

  • भाषा: साधी, स्वाभाविक, प्राणी आणि मानव यांचा संवाद

  • लक्षणीय शब्द: कैफियत, पोटशूळ, अंधश्रद्धा, तडफडशील

  • प्रमुख संदेश: पर्यावरण रक्षण, पशुपक्ष्यांबद्दल करुणा, माणसाचे जागृतीकरण



संकल्पना, प्रस्तुति, संपादन एवं लेखन

● मच्छिंद्र बापू भिसे 'मंजीत'● ©®
शिक्षण सेवक
जिला परिषद हिंदी वरिष्ठ प्राथमिक पाठशाला, विचारपुर, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
9730491952
सातारा (महाराष्ट्र)

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